बिहार विधानसभा चुनाव : तेजस्वी और चिराग पर है पार्टी व जनता में नेतृत्व साबित करने की चुनौती

रिपोर्ट: ऋतुराज कुमार
2020 का बिहार विधानसभा चुनाव बेहद खास और दिलचस्प होने वाला है। विशेषकर तेजस्वी और चिराग के लिए। नीतीश कुमार की जेडीयू जहां एनडीए में फिर शामिल हो गई है वहीं सालों तक एनडीए का हिस्सा रहे रामविलास पासवान की एलजेपी उनकी मृत्यु के साथ ही चिराग पासवान की अगुवाई में बिहार में अलग हो गई है, वो अलग बात है कि एलजेपी अभी भी केंद्र में बीजेपी का दामन थामे हुए है। चिराग पासवान खुले तौर पर कह रहे हैं कि उन्हें बीजेपी से परहेज नहीं है लेकिन, उन्हें बिहार में नीतीश स्वीकार नहीं हैं। दरअसल चिराग खुद को बिहार में नीतीश के विकल्प के तौर पर पेश करना चाह रहे हैं। यही हाल आरजेडी की कमान संभाल रहे लालू के छोटे लाल तेजस्वी यादव का भी है। पिछला विधानसभा चुनाव (2015) जेडीयू व आरजेडी साथ मिलकर लड़े थे और सरकार भी बनाई थी। लेकिन, यह गठबंधन अपना कार्यकाल पूरा न कर पाया और साथ छूट गया। दरअसल, बिहार में तेजस्वी और चिराग दोनों अपने लिए जमीन तलाशने में लगे हैं क्योंकि दोनों के ही ऊपर अपनी पार्टी व संगठन को जीवित रखने का दबाव है। आरजेडी सुप्रीमो व तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में जहां रांची की जेल में सजा काट रहे हैं वहीं, चिराग के सर से चंद दिनों पहले ही उनके पिता रामविलास पासवान का साया हमेशा के लिए उठ गया। वैसे रामविलास ने अपनी बीमारी की वजह से पहले ही अपनी राजनीतिक विरासत और एलजेपी की कमान चिराग को सौंप दी थी वहीं, लालू अब भी जेल से ही अपनी पार्टी के महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं। जिसके पालन करने की जिम्मेदारी तेजस्वी की होती है। तेजस्वी और चिराग अब इस दबाव व दायरे से बाहर आना चाहते हैं। ये दोनों युवा नेता बिहार की जनता को खुद को नीतीश का विकल्प बता रहे हैं। चिराग की एलजेपी जहां एनडीए में रहते हुए कुछ सीटों तक सिमटी रहती थी इस बार अधिक से अधिक सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार रही है। जहां जेडीयू के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं वहां से चिराग ने बीजेपी के बागी नेताओं को टिकट देकर मैदान में उतार दिया है। चिराग की यह चाल बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बन गई है। इधर तेजस्वी ने भी कई नए चेहरों को आरजेडी का टिकट थमाया है। तेजस्वी अब यह स्वीकार करते हैं कि उनके माता-पिता के कार्यकाल के 15 सालों में कुछ गलतियां हुई हैं लेकिन वो नीतीश कुमार के 15 साल के कार्यकाल पर भी सवाल उठाते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यह दोनों युवा नेताओं पर अपने नेतृत्व क्षमता को साबित करने की चुनौती और मौका दोनों है। अगर जेडीयू-बीजेपी गठबंधन बहुमत के साथ फिर सत्ता में वापसी करती है तो इन दोनों नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। जिससे उबरना इन दोनों युवाओं के लिए आसान नहीं होगा। वहीं अगर इन्होंने एनडीए को सत्ता में वापस आने से रोक दिया तो फिर ये किंगमेकर की भूमिका में आ जाएंगे जैसे एक दौर में इनके पिता लालू व रामविलास थे। फिलहाल तेजस्वी व चिराग का भविष्य क्या होगा यह जानने के लिए 10 नवंबर तक का इंतजार करना होगा इसी दिन बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होंगे।

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